Friday, March 6, 2026
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विश्व रेडियो दिवस विशेष: बदलते दौर में भी जिंदा है रेडियो का जादू, गाजीपुर में आज भी धड़कता है ‘आवाज का संसार


रमेश प्रसाद सोनी ब्यूरो चीफ
गाजीपुर।
दुनिया तेजी से बदल रही है। मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस दौर में संचार के साधन पल-पल नए रूप ले रहे हैं। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब रेडियो हर गांव, गिराव और झुग्गी-झोपड़ी तक सूचना और मनोरंजन का सबसे विश्वसनीय माध्यम हुआ करता था। सुबह की शुरुआत आकाशवाणी के समाचार से होती थी और रातें विविध भारती के गीतों के साथ ढलती थीं। लोगों के जीवन में रेडियो केवल एक यंत्र नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य जैसा था।
संचार क्रांति के आगमन के बाद भले ही मोबाइल और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने रेडियो की जगह काफी हद तक ले ली हो, लेकिन आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जिनके दिलों में रेडियो की वही पुरानी मधुर धुन गूंजती है। गाजीपुर जिले में भी ऐसे कई लोग हैं, जो इस विरासत को आज तक संजोए हुए हैं।
अनिल पांडे: रेडियो के कारीगर और सच्चे श्रोता
जखनियां ब्लॉक के गौरा खास निवासी अनिल पांडे आज भी रेडियो के कारीगर के रूप में जाने जाते हैं। जब अधिकतर लोग खराब रेडियो को कबाड़ समझकर फेंक देते हैं, तब अनिल पांडे उसे फिर से जीवन दे देते हैं। वे न केवल रेडियो की मरम्मत करते हैं, बल्कि नियमित रूप से उसका प्रसारण भी सुनते हैं।
उनका कहना है, “रेडियो की आवाज में जो सादगी और अपनापन है, वह किसी और माध्यम में नहीं मिलता। समाचार हो या संगीत, रेडियो सीधे दिल से जुड़ता है।”
बाजार से स्टेशन तक गूंजती है रेडियो की धुन
दुल्लहपुर बाजार में श्रीराम प्रजापति आज भी अपने काम के बीच रेडियो पर समाचार और गीत सुनना पसंद करते हैं। उनके अनुसार, रेडियो सुनने से दिन भर की भागदौड़ में भी एक सुकून मिलता है।
वहीं दुल्लहपुर रेलवे स्टेशन के बाहर जलपान की दुकान चलाने वाले शबलू मद्धेशिया प्रतिदिन अपनी दुकान पर रेडियो जरूर बजाते हैं। यात्रियों के साथ-साथ वे खुद भी समाचार और पुराने गीतों का आनंद लेते हैं। वे कहते हैं, “मोबाइल पर सब कुछ है, लेकिन रेडियो की बात ही अलग है। इसमें गांव-देहात की खुशबू है।”
13 फरवरी: विश्व रेडियो दिवस
प्रतिवर्ष 13 फरवरी को पूरी दुनिया ‘विश्व रेडियो दिवस’ मनाती है। यह केवल एक तकनीकी माध्यम का उत्सव नहीं, बल्कि उस अदृश्य जादुई धागे का अभिनंदन है, जिसने पूरी पृथ्वी को एक वैश्विक गांव (Global Village) में पिरो दिया है।
रेडियो शून्य से संवाद तक की मनुष्य की महायात्रा का सजीव प्रतीक है। यह वह माध्यम है, जिसने सीमाओं, भाषाओं और दूरियों को पार कर लोगों को जोड़ा। प्राकृतिक आपदा हो, युद्धकाल हो या चुनावी माहौल—रेडियो ने हर परिस्थिति में अपनी विश्वसनीयता साबित की है।
आज भी प्रासंगिक है रेडियो
ग्रामीण क्षेत्रों में जहां इंटरनेट की पहुंच सीमित है, वहां रेडियो आज भी सूचना का सशक्त साधन है। कम लागत, सरल उपयोग और व्यापक पहुंच इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
गाजीपुर जैसे जनपद में, जहां परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चलती हैं, वहां रेडियो आज भी अपनी मधुर धुनों के साथ जीवित है।
विश्व रेडियो दिवस के अवसर पर यह कहना गलत नहीं होगा कि तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, लेकिन रेडियो का जादू कभी फीका नहीं पड़ेगा। यह केवल आवाज नहीं, बल्कि भावनाओं का वह सेतु है, जो पीढ़ियों को जोड़ता है।

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