Monday, May 25, 2026
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यूपी में इतिहास बदलने की तैयारी: कार्यकाल खत्म होने के बाद ‘प्रधान’ ही बनेंगे गांवों के ‘प्रशासक

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बड़ी राहत: 26 मई को समाप्त हो रहा है 57,694 ग्राम प्रधानों का कार्यकाल, 48 घंटे में फैसले की उम्मीद

नया प्रयोग: राजस्थान और मध्य प्रदेश की तर्ज पर योगी सरकार कर रही विचार, ADO पंचायत की जगह पूर्व प्रधानों को ही मिल सकती है कमान

उत्तर प्रदेश के त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव और ग्रामीण विकास को लेकर योगी सरकार एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लेने जा रही है। प्रदेश की 57,694 ग्राम पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल आगामी 26 मई को समाप्त हो रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इसके बाद गांवों में विकास कार्य न रुकें, इसके लिए सरकार पहली बार मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही ‘प्रशासक’ (एडमिनिस्ट्रेटर) नियुक्त करने की तैयारी में है। इस संबंध में अगले 48 घंटों के भीतर आधिकारिक गाइडलाइन जारी हो सकती है।
अब तक उत्तर प्रदेश में व्यवस्था रही है कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद सहायक विकास अधिकारी (ADO पंचायत) को प्रशासक नियुक्त किया जाता था। लेकिन, एक साथ इतनी बड़ी संख्या में सरकारी अधिकारियों पर कार्यभार बढ़ने से गांवों के विकास कार्य और मनरेगा जैसी योजनाएं प्रभावित होती थीं। इसी को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड के मॉडल की तर्ज पर मौजूदा प्रधानों पर ही भरोसा जताने का मन बना रहे हैं।
अधिकारों पर रहेगी कैंची, नहीं ले सकेंगे नीतिगत फैसले
सूत्रों के अनुसार, यदि पूर्व प्रधानों को प्रशासक बनाया जाता है, तो उनके अधिकारों को सीमित किया जाएगा।
रूटीन कार्य: वे केवल रोजमर्रा के प्रशासनिक काम और पहले से चल रही योजनाओं की देखरेख कर सकेंगे।
वित्तीय पाबंदी: नए वित्तीय फैसले या बड़े बजट को पास करने का अधिकार उनके पास नहीं होगा।
विशेष परिस्थिति: यदि गांव में कोई आकस्मिक या नीतिगत फैसला लेना अनिवार्य हुआ, तो उसका प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) के माध्यम से जिलाधिकारी (DM) को भेजा जाएगा। जिलाधिकारी की लिखित अनुमति के बाद ही वह कार्य हो सकेगा।
आखिर क्यों टल रहे हैं पंचायत चुनाव?
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि यूपी पंचायत चुनाव अब वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद ही कराए जा सकते हैं। चुनाव टलने के पीछे तीन मुख्य तकनीकी और वैधानिक कारण सामने आ रहे हैं:
ओबीसी आरक्षण का ‘ट्रिपल टेस्ट’: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए ‘समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग’ का गठन किया गया है। रामऔतार सिंह की अध्यक्षता वाला यह 5 सदस्यीय आयोग अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहा है, जिसमें कम से कम 3 महीने का समय लगेगा।
वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण: प्रदेश में मतदाता सूचियों के नवीनीकरण का काम चल रहा है। अंतिम वोटर लिस्ट जून के द्वितीय सप्ताह तक आने की उम्मीद है।
प्रशासनिक तैयारियां: चार अलग-अलग रंगों (सफेद, गुलाबी, नीला और पीला) के मतपत्रों की छपाई और मतपेटियों के प्रबंधन में अभी समय लगना तय है।
पॉलिटिकल माइलेज की कोशिश:
जानकारों का मानना है कि यदि सरकार प्रधानों को ही प्रशासक बनाती है, तो ग्रामीण स्तर पर एक बड़ा राजनीतिक असंतोष टल जाएगा। चुनावी साल (2027) से ठीक पहले लाखों ग्रामीण जनप्रतिनिधियों को अपने पाले में रखने के लिहाज से भी भाजपा सरकार का यह कदम बेहद मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है।

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