Monday, May 25, 2026
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तपती धूप में प्यासा नंदगंज, करोड़ों की बाजार, लेकिन राहगीरों के लिए एक प्याऊ तक नहीं


आबिद शमीम /नूर सबा
नंदगंज (गाज़ीपुर )नंदगंज की चिलचिलाती गर्मी इन दिनों लोगों की परीक्षा ले रही है। सूरज की आग उगलती किरणों के बीच जहाँ इंसान दो कदम चलने में बेहाल हो रहा है, वहीं करोड़ों का कारोबार करने वाली इतनी बड़ी बाजार में प्यास बुझाने के लिए एक भी सार्वजनिक प्याऊ का इंतज़ाम नहीं होना कई सवाल खड़े कर रहा है।
बाजार में रोज़ाना दूर-दराज़ गांवों से हजारों लोग खरीदारी करने आते हैं। महिलाएं, बुज़ुर्ग और छोटे-छोटे बच्चे इस भीषण गर्मी में घंटों बाजार में घूमते हैं, लेकिन प्यास लगने पर उन्हें पानी के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है। मजबूरी में लोग दुकानों पर बिकने वाला बोतलबंद पानी खरीदने को विवश हैं। गरीब और मजदूर तबके के लिए यह अतिरिक्त बोझ बनता जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या समाजसेवा अब सिर्फ मंचों और सोशल मीडिया तक सीमित रह गई है? कभी एक दौर था जब लोग पुण्य कमाने के लिए रास्तों पर प्याऊ लगवाते थे, कुएँ खुदवाते थे, तालाब बनवाते थे ताकि राहगीरों को राहत मिल सके। गांव-शहर की पहचान ही इंसानियत और सेवा से होती थी। लेकिन आज आधुनिकता और करोड़ों के कारोबार के बीच इंसानियत कहीं खोती नजर आ रही है।
हैरानी की बात यह भी है कि प्रशासन की ओर से भी अब तक कोई पहल नहीं दिखाई दी। इतनी बड़ी बाजार में समाजसेवी संस्थाएं और सक्षम व्यापारी वर्ग अगर चाहें तो जगह-जगह शुद्ध पेयजल की व्यवस्था कर सकते हैं, लेकिन फिलहाल हालात यह हैं कि प्यास से परेशान लोग खुद अपनी जेब ढीली करने को मजबूर हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर बाजार में कुछ स्थानों पर अस्थायी प्याऊ या ठंडे पानी की व्यवस्था कर दी जाए तो राहगीरों और बच्चों को बड़ी राहत मिल सकती है। यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि मानवता का सबसे बड़ा धर्म है।
भीषण गर्मी के इस दौर में नंदगंज बाजार का यह दृश्य समाज और प्रशासन—दोनों के लिए एक आईना है, जो यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर विकास की दौड़ में हम इंसानियत को कहाँ पीछे छोड़ आए हैं?

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